अररिया।
बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली की एक और विचलित करने वाली तस्वीर अररिया जिले से सामने आई है। जहाँ एक तरफ सरकार बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के दावे करती नहीं थकती, वहीं दूसरी तरफ एक मृत युवती के शव को पोस्टमार्टम से पहले महज एक एक्स-रे के लिए तीन प्रखंडों की खाक छाननी पड़ी।
क्या है पूरा मामला?
फारबिसगंज प्रखंड के घोड़ाघाट में हुई एक दुखद गोलीबारी की घटना में चांदनी नामक युवती की मौत हो गई। कायदे से शव का पोस्टमार्टम अररिया सदर अस्पताल में तुरंत हो जाना चाहिए था, लेकिन सिस्टम की खामियों ने मृतक के परिजनों की पीड़ा को और बढ़ा दिया।
सदर अस्पताल में मशीन खराब: जब शव को अररिया सदर अस्पताल लाया गया, तो पता चला कि यहाँ की एक्स-रे मशीन खराब है।
फारबिसगंज में भी नहीं मिली राहत: अस्पताल प्रशासन ने शव को फारबिसगंज रेफर कर दिया। लेकिन विडंबना देखिए, वहाँ भी एक्स-रे की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।
रानीगंज में हुआ एक्स-रे: अंततः शव को रानीगंज ले जाया गया, जहाँ एक्स-रे की प्रक्रिया पूरी हुई। इसके बाद दोबारा शव को अररिया सदर अस्पताल लाया गया, तब जाकर पोस्टमार्टम हो सका।
जनप्रतिनिधियों में भारी आक्रोश

इस मामले को लेकर जिला पार्षद इश्तियाक आलम ने स्वास्थ्य विभाग और सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इसे प्रशासन की बड़ी नाकामी बताते हुए कहा:
“यह बेहद शर्मनाक है कि जिले के मुख्य अस्पताल में बुनियादी सुविधाएं तक ठप हैं। एक मृत शरीर को घंटों तक एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल घुमाना संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। सरकार को जवाब देना होगा कि करोड़ों के बजट के बावजूद जनता को यह जिल्लत क्यों झेलनी पड़ रही है?”
सिविल सर्जन की सफाई
मामले के तूल पकड़ने पर अररिया के सिविल सर्जन के.के. कश्यप ने अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि अस्पताल में एक्स-रे सेवा का संचालन एक निजी एजेंसी के माध्यम से किया जाता है। उन्होंने आश्वासन दिया कि तकनीकी खराबी को अगले दो दिनों के भीतर दुरुस्त कर लिया जाएगा।
सवाल जो खड़े होते हैं:
क्या जिले के सबसे बड़े अस्पताल में एक्स-रे जैसी बुनियादी सुविधा के लिए कोई ‘बैकअप’ प्लान नहीं होना चाहिए?
निजी एजेंसियों के भरोसे चल रही व्यवस्था में जवाबदेही किसकी है?
क्या संवेदनहीनता के इस खेल में दोषियों पर कोई कार्रवाई होगी या ‘दो दिन में ठीक होगा’ जैसे आश्वासनों के पीछे मामला दबा दिया जाएगा?
अररिया की यह घटना राज्य की जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था और अफसरों की लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण बन गई है।






















